Friday, April 19, 2013

आकंड़ो की ज़िन्दगी...

कंक्रीट के घने जंगल में,
सोच रहा है, वो अकेला ।
रोज देखता रहता है वो,
आंकड़ो का अनूठा मेला।

लगा, तंबू सब बेच रहे हैं,
कहते इसको कारोबार ।
जीवन प्रयन्त चलता ये चक्र,
कभी न रुकता है  संसार ।

क्रय -विक्रय का खेल अनोखा ,
हर कोई है  इसका मारा ।
कभी तैरते तुम , मझधार में ,
कभी पकड़ लेते किनारा ।

कभी नहीं मिटती भूख यहाँ ,
खा लो चाहे जितने अनार ।
हर किसी को तलब लगी है ,
हर कोई है यहाँ बीमार ।

महल  बनाने का सपना पाले ,
फिरता रहा मारा -मारा ।
बना कर  महल वो क़र्ज़ का ,
कहलाता, महल-वाला बेचारा !

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