Tuesday, December 3, 2019

समय और माया



अंतरिक्ष-अंतराल के मंच पटल पर
स्वपन निरर्थक बुनते तुम,
उनमे मादक अर्थ घोल दाल
मोहिनी माया रचते तुम | 

प्राण वायु को झंकृत कर
जीवन-राग सुनाते हो,
स्मृतियों को साक्ष्य बनाकर
सुरीला षड़यंत्र रचते तुम | 
     
चाहे हो प्रियतम का स्पर्श
या निरुपम-दृश्य-प्रहर्ष,
अंतरंग होंठो का अमर्त्य स्वाद
वर्षा-सुगंध या माधुर्य राग | 
तुममे प्रकृति की अनुभूति है
हर अनुभव तुममे सीमाबद्ध ,
घटनाक्रम के मृगतृष्णा में
प्रतिबिंबित करते संबंध स्पष्ट। 

तुम  कारण हो हर कारण का
हर कारण तुममे बसता है ,
जो अंत तुम्हारा होता है
तो शाश्वत स्वपन टूटता है | 

मैं तुममे निहीत नहीं
तुम मुझमे निहित हो ,
मैं निश्चल-नित्य-निराकार ब्रहम
तुम चंचल-चतुर-चिरंतन भ्रम |