Friday, April 19, 2013

मधुमेह का डर...



खड़े हो कर मंच प़र,
दिखाया उसने एक सुन्दर सपना।
बात बात पर, बार बार वो,
कहता रहता हमे अपना!

कह रहा था, इस बार,
बदलेगा ये राष्ट्र हमारा।
सबको मिलेगी रोटी,
कोई न रहेगा, भूखा बेचारा।

हमे दर्द में देख,
उसका ह्रदय रो पड़ा।
उसकी आँखों से,
आँसू का एक कतरा गिर पड़ा।


कहता था , हम वो हर कुछ पाएंगे,
जो हमने पिचले वर्षो में नहीं पाया।
इतनी मीठी बातें सुनकर,
मधुमेह का डर सताया।


आकंड़ो की ज़िन्दगी...

कंक्रीट के घने जंगल में,
सोच रहा है, वो अकेला ।
रोज देखता रहता है वो,
आंकड़ो का अनूठा मेला।

लगा, तंबू सब बेच रहे हैं,
कहते इसको कारोबार ।
जीवन प्रयन्त चलता ये चक्र,
कभी न रुकता है  संसार ।

क्रय -विक्रय का खेल अनोखा ,
हर कोई है  इसका मारा ।
कभी तैरते तुम , मझधार में ,
कभी पकड़ लेते किनारा ।

कभी नहीं मिटती भूख यहाँ ,
खा लो चाहे जितने अनार ।
हर किसी को तलब लगी है ,
हर कोई है यहाँ बीमार ।

महल  बनाने का सपना पाले ,
फिरता रहा मारा -मारा ।
बना कर  महल वो क़र्ज़ का ,
कहलाता, महल-वाला बेचारा !