Tuesday, December 3, 2019

समय और माया



अंतरिक्ष-अंतराल के मंच पटल पर
स्वपन निरर्थक बुनते तुम,
उनमे मादक अर्थ घोल दाल
मोहिनी माया रचते तुम | 

प्राण वायु को झंकृत कर
जीवन-राग सुनाते हो,
स्मृतियों को साक्ष्य बनाकर
सुरीला षड़यंत्र रचते तुम | 
     
चाहे हो प्रियतम का स्पर्श
या निरुपम-दृश्य-प्रहर्ष,
अंतरंग होंठो का अमर्त्य स्वाद
वर्षा-सुगंध या माधुर्य राग | 
तुममे प्रकृति की अनुभूति है
हर अनुभव तुममे सीमाबद्ध ,
घटनाक्रम के मृगतृष्णा में
प्रतिबिंबित करते संबंध स्पष्ट। 

तुम  कारण हो हर कारण का
हर कारण तुममे बसता है ,
जो अंत तुम्हारा होता है
तो शाश्वत स्वपन टूटता है | 

मैं तुममे निहीत नहीं
तुम मुझमे निहित हो ,
मैं निश्चल-नित्य-निराकार ब्रहम
तुम चंचल-चतुर-चिरंतन भ्रम |     

Thursday, November 23, 2017

बचपन

बचपन को देखा है कभी ?
जाड़े की उस बहती नदी की तरह है!
तरल, बिलकुल निर्मल,
गरम भाप भरी अंगड़ाइयाँ लिये |

अब कभी महसूस किया है उसे ?
मिला करता है, पलकों के पीछे।
सपनो के चादर में लिपटे,
बेफिक्री की खिलखिलाहट लिये |

छूट गया !
जैसे हर कुछ छूटता है |
खो गया है,
जवानी की उस सपाट-बंजर-दरदरी खेतों में |

छुप गया है कहीं, 
दुनियादारी के डर से,
शायद, उस घने आम के पेड़ के बीच में !

या फिर,
उस कटी पतंग को ढूंढने गया होगा |
लौट आएगा वापस...


Wednesday, March 4, 2015

सन्नाटे...

हँसते सन्नाटे , रोते सन्नाटे,
डरते सन्नाटे , डराते सन्नाटे,
काले सन्नाटे , लाल सन्नाटे,
कई रंग लिए, रंगहीन सन्नाटे। 

शब्दों के समुंद्र लीये, मौन सन्नाटे,
हर कण में छुपे, अंतहीन सन्नाटे,
हर क्षण, हर समय उपस्थित , 
अदृश्य सन्नाटे। 

विजय के लहर में, उफनती मौत के सन्नाटे,
सफलता शिखर पर, संघर्ष के सन्नाटे।,

धर्म-ग्रंथो में, भ्रम के सन्नाटे,
काल गति में हैं, स्थिर सन्नाटे। 

अचेत प्राण में, चेत सन्नाटे ,
नदी के बीच बहते सन्नाटे । 

पिघलती लावा में, ठंडे होते सन्नाटे \,
कई प्रश्नो के उत्तर सन्नाटे । 


Tuesday, April 15, 2014

जहाँ गहन अँधेरा हो!

ऐसी जगह बताओ पथिक,
जहाँ गहन अँधेरा हो।
रात सोती हो जहाँ पर,
न कोई सवेरा हो।

रूठ, सन्नाटा जाती जहाँ,
हर क्षण बस बेहोशी हो।
ऐसी जगह बताओ पथिक
जहाँ ख़ामोशी ही ख़ामोशी हो।

शब्द निरर्थक हो जहाँ पर,
ना,चेतना का सहारा हो।
न मझधार हो, ना किनारा,
बस अनदेखी धारा!

न कल्पना की, लकीरें जहाँ,
न यथार्थ-धरातल हों।
जहाँ साँसें ठोस, और
जीवन तरल हो।

ना रोष, ना उल्लास हो।
बस सम्पूर्ण शांति बसेरा हो।

ऐसी जगह बताओ पथिक,
जहाँ गहन अँधेरा हो।

Sunday, October 20, 2013

पूड़ी और सब्ज़ी का सपना

आज एक सपना देखा,
सपने में पूड़ी और सब्ज़ी देखी । 
पीले रंग की पूड़ी, उसके अंदर भरी हुई दाल भी पीली। 
सब्ज़ी का भी रंग पीला । 

पूड़ी से एक खुशबू आ रही थी । 
मैंने पूछ लिया, आजकल कैसी हो ?
उसने कहा, अच्छी हूँ,
आपके जूनियर्स आते रहते हैं । 

बगल में, शीशे के ग्लास में चाय रखी थी। 
उससे आती खुशबू ने, इस बात पर मुस्कुरा दिया।

चाय ने पुछा, वहाँ की चाय कैसी होती है ?
मैंने कहा, कुछ खास नहीं। 
तुम चाय हो, वो चाय जैसी होती हैं … 

फिर बातचीत में हमेशा की तरह मौसम ने कदम रखा ,
उनके ये पूछने पर मैंने कहा,
हवाएँ तो ठण्डी और शुष्क हैं !
पर उनमे ठहाको की बड़ी कमी है …  

बातें चलती रही, दिन चढ़ रहा था। 
मेरी नींद खुली तो, यहाँ रात गहरी थी। 
 

Thursday, August 15, 2013

नदी...


मैं बचपन में कई घंटे नदी के किनारे बैठ कर नदी को बहते हुए देखता था। ना जाने कितने घंटे मैंने बिताये होंगे नदी को देखते हुए। नदी से ज्यादा अनुभवी मैंने कभी किसी को नहीं देखा था। पता नहीं कितने रहस्य वो अपने में समेटे बहती जाती है। ऐसा लगता है जैसे हजारों गाँव-कस्बो की कहानी को अपने में घोले हुए है। जैसे जैसे वो अपने श्रोत से दूर होती है, और गंभीर होते जाती है। अपने उद्गम के नजदीक, एक लड़के की तरह उत्साहित रहती है, पर उद्गम से दूरी उसे शांत और गंभीर बना देती है।

नदी ने सिर्फ कई कस्बो या गाँव को ही नहीं, बहुत लम्बे समय को भी देखा है। समय की कहानी भी उसने सुनी है। जब गाँव बसा नहीं था, तब भी नदी थी, नदी ने गाँव को बसते देखा, बच्चो को बड़ा होते देखा, बुढो को मरते हुए देखा। अनुभव का एक बड़ा सागर नदी के साथ बहता है। मैं जब भी नदी किनारे बैठता था। एक बहुत ही बूढ़े अनुभवी के बगल में बैठने का एहसास होता था।

कुछ दिन पहले तक मैंने नदी से ज्यादा रहस्मयी और अनुभवी कुछ नहीं देखा था। लेकिन आज अचानक उस लडके को देख ऐसा लगा जैसे वो, 18 साल का लड़का नहीं, हजारों साल का बुढा है। उसके चेहरे को देख कर ऐसा लग रहा था की उसने बहुत कुछ देखा है, बहुत कुछ जानता है वो। पहली बार मुझे ऐसा महसूस हो रहा था की शायद नदी  इस लडके से कम गंभीर होगी। पर मैं इतनी जल्दी इस निष्कर्ष पर नहीं पहुचना चाहता था।

पूछने पर उसने अपना नाम अरुण बताया। वो उस चाय की दूकान में काम करता था, जहा मैं शाम को बैठता था। उसके हाव-भाव में काफी भारीपन था, एक बहुत ही अनुभवी बुजुर्ग की तरह वो हर काम को कर रहा था। मैं शायद उसकी दक्षता से आकर्षित था, और उसे गौर से देख रहा था। काम के बीच में उसने मुझे, उसे देखते हुए देखा । मैं उसे देख मुस्कुरा दिया, बदले में वो भी मुस्कुराया।

कुछ दिनों में हम एक दुसरे को पहचानने लगे थे, पर हमारी पहचान सिर्फ मुस्कुराहट तक ही सीमित थी। एक दिन मैंने उसे अपने पास बुला कर पुछा की कहाँ का रहने वाला है? मुझे यह जान कर आश्चर्य हुआ की वो हमारे पड़ोस के गाँव से ही है, जो की नदी के उस पार है। मैंने उससे पुछा, शहर में क्यूँ आये हो ? तो उसने बताया की गाँव में उसका कोई है नहीं, तो शहर में कुछ पैसे कमाने आ गया। पर उसके जवाब में अजीब सी भाव-शुन्यता थी। शायद किसी बात से वो उदास था। मैंने उससे और कुछ पूछने की कोशिश नहीं की।

मुझे उससे बात करना काफी अच्छा लगने लगा था, ऐसा लगता था फिर से मैं नदी के किनारे बैठा हूँ।  मैं उससे अक्सर कुछ ना कुछ पूछते रहता था, शायद मुझे उसके इतना अनुभवी प्रतीत होने का रहस्य जानना था। मैं जानना चाहता था की ऐसा क्या है, जिसने उसे नदी की तरह बना दिया है।

शाम के समय दुकान में भीड़ हुआ करती थी, तो उससे ज्यादा बात नहीं हो पाती थी। उससे बात करने के लिए मैं शनिवार या रविवार  को दुकान पर काफी पहले चाय पिने जाने लगा था। एक दिन ऐसे ही बातों ही बातों में उसने बताया की उसे भी गाँव की नदी बहुत पसंद थी, और अक्सर वो भी नदी के किनारे घंटो बैठा करता था।  हम अक्सर नदी की बातें किया करते थे। शायद नदी से हमारा लगाव, उसे मेरे और नजदीक ले आया था। वो अब थोड़ा खुल कर बातें करने लगा था।

उसने बताया की बाप के मरने के कुछ दिन बाद ही उसकी माँ भी चल बसी। वो शायद उस समय 11-12 साल का रहा होगा। वो अपना गुजारा कूड़े से मिला पुराना सामान बेच कर किया करता था, पर गाँव में बहुत ज्यादा मात्रा में कूड़ा होता नहीं था, तो उसे दो तीन दिनो तक भूखे रहना पड़ता था। उसने बाद में रात में लोगो के खेतो से गाजर, मुली या आलू आदी चुरा कर खाना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे उसकी आदत रातों में जागने और दिन में सोने की हो गयी। वो रात में किसी के खेत से थोड़ी बहुत सब्जी चुरा कर, नदी किनारे खाने बैठ जाता था। वो रात भर नदी को बैठ कर देखा करता था।

उसने बताया की उसे चाँदनी रात में नदी बहुत सुन्दर लगती थी। ऐसा लगता था जैसे पूरी नदी में पिघला हुआ चाँदी बह रहा हो। वो रातों में नदी की मछलियों को पकड़ कर आग में भुन कर खा लिया करता था। कभी -कभी रात को नदी में तैरता भी था। मैंने उससे पूछा की उसे रात में डर नहीं लगता था? उसने कहा भूख ने सारा डर ख़तम कर दिया था। अगर वो डरता तो शायद मर जाता और फिर शुरुआत के कुछ दिनों के बाद उसे रात ही अच्छी लगने लगी थी । उसे अब रात डरावनी कम और खुबसूरत ज्यादा लगती थी।

माँ -बाप के गुजर जाने और किसी अपने के ना होने के कारण उसने प्रकृति के कच्चे स्वरुप को देखा था। शायद इसी मूल अनुभव में उसे इतना दक्ष बनाया होगा। उसने परिस्थितियों के अनुसार ढलना काफी जल्दी सीख लिया था।

मैंने उससे पुछा की जब गाँव उसे इतना पसंद था तो यहाँ क्यूँ आया। उसने बताया की वो गाँव को छोड़ा नहीं था, वहां से भागा था। एक रात एक खेत के मालिक ने उसे आलू चुराते पकड़ लिया, और उसकी बुरी तरीके से पिटाई कर दी। एक-दो दिनों तक चल-फिर नहीं पाया और भूख से उसकी हालत ख़राब होते जा रही थी।उसके पास न तो इलाज़ के पैसे थे ना ही खाने के। पानी पी कर काम चला रहा था, और फिर दुबारा चोरी करने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाया।

गाँव में चोर का तमगा लगने के कारण, उसे वहां खाना ढूंढने में कठिनाई हो रही थी। इसलिए वो गाँव छोड़ कर शहर की तरफ चल दिया । उसने शहर आने के लिए एक ट्रक वाले से लिफ्ट ली थी। शहर आते समय उसने ट्रक वाले को बताया की वो बहुत दिनों से कुछ खाया नहीं है, और उसे भूख लगी है। ट्रक वाले ने उसे रास्ते के एक होटल में खाना खिलाया। ट्रक वाले ने इससे पूछा की अगर वो उसके साथ ट्रक में काम करना चाहे तो कर सकता है, उसे शहर में काम ढूंढने की जरुरत नहीं होगी, और बदले में वो इसे तीनो समय खाना मिलेगा।

अरुण को एक स्थायी सहारा मिल गया था। वो ट्रक वाले की मदद, ट्रक साफ़ करने, सामान उतारने-चढाने जैसे कामो में करने लगा था। ट्रक की नौकरी ने उसे लगभग पूरा देश दिखा दिया। उसने कई मिलो की दूरी तय की, रास्ते में उसने बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ देखा। वो अगले चार-पाँच सालों तक ट्रक वाले के साथ था।

 मेरे ये पूछने पर की उसने ट्रक की नौकरी क्यूँ छोड़ी, उसने बताया की ट्रक एक सड़क दुर्घटना की चपेट में आ गयी और ट्रक वाले की उस हादसे में मौत हो गयी। मौत को कई बार उसने अलग अलग रूप में देखा था। ट्रक वाले की असमय मृत्यु ने उसे विचलित कर दिया था। वो फिर से ट्रक में काम नहीं करना चाहता था, इसलिए वो यहाँ शहर में आ कर चाय की दूकान में काम करने लगा था।

उसकी कहानी मुझे बहुत रोचक और मार्मिक लगी थी, और मुझे ये एहसास होने लगा था की अरुण इतना अनुभवी क्यूँ प्रतीत होता है। मेरा ये अनुमान था की, कोई एक घटना या परिस्थिति ने उसे इस तरह बदल दिया होगा, लेकिन किसी एक घटना से इतना कुछ शायद ही कोई सीख पायेगा।

माँ-बाप के बचपन में ही गुजर जाने के कारण वो पढाई नहीं कर सका था। मैंने उसे थोड़ा बहुत गणित पढाना शुरू कर दिया था। जैसे वो अपने हर काम में हुनरमंद था, वैसे ही गणित में जल्दी ही काफी कुछ सीख लिया। पैसो का हिसाब किताब उसे अच्छे से समझ आने लगा था। वो रोज के पैसो को बचा कर अपनी चाय की दुकान खोलने की सोच रहा था।

समय इसी तरह गुजरता जा रहा था। एक शनिवार अरुण दूकान पर दिखा नहीं, जो पहले कभी हुआ नहीं था। मैंने दूकान वाले से पूछा तो उसने कहा की अरुण पिछले तीन दिनों से दूकान पर नहीं आया है। मैंने दुकानदार से पूछा की उसने कुछ बताया है की वो कहाँ गया है? उसने इसका जवाब नहीं में दिया।

पता नहीं क्यूँ, मैं उदास महसूस कर रहा था । ऐसा लग रहा था जैसे कोई बचपन के दोस्त ने हमेशा के लिए छोड़ दिया मुझे। मैं फिर से नदी से दूर हो गया था।  मैं उसके अचानक शहर छोड़ने का कारण नहीं समझ पा रहा था।

मुझे ऐसा लगता है, अरुण ने नदी से काफी कुछ सीखा होगा। मैं शायद उतना कुछ नहीं सीख पाया। वो नदी की तरह गतिमान था, बहते रहना जानता था, वो नदी के पानी की तरह तरल था, हर आकार में ढल जाता था। उसे किताबे तो नहीं मिली पर उसे प्रकृति अपने कच्चे और वास्तविक स्वरुप में मिली। उसमे सीखने की क्षमता मुझसे ज्यादा थी जो उसे मुझसे कहीं ज्यादा विकसित मनुष्य बनाती है।

शायद डार्विन उसे "फिटेस्ट " कहता। 

Thursday, July 25, 2013

भीड़ का भिखारी


बाज़ार में बहुत भीड़ थी | हर कोई कुछ ना कुछ खरीद रहा था | वैसे बाज़ार की भी अपनी एक आवाज़ होती है, एक ऐसी आवाज़ जो हजारों आवाजों के मिलने से बनती  है | ऐसा लगता है, मानो ढेर सारे लोग मधुमखियों की आवाज़ निकालने की कोशिश कर रहे हैं | बाज़ार से बाहर निकलने पर ऐसा लगता है जैसे एक अरसे बाद कहीं से निकला हूँ | बाज़ार में  समय तेज चलने लगता है, हर कोई भागता फिरता है | सब कुछ न कुछ करते रहते हैं, कोई खरीदता है, कोई बेचता है |

इसी भीड़ में एक भिखारी बैठा है, थक गया है वो भीख माँगते माँगते | सुबह से कुछ 5 -6  रुपये मिले होंगे उसे| पर आजकल 5 -6  रूपये से क्या होता है!?  वो सोच रह है दस हो जाते तो वो घर चला जायेगा| घर से मतलब है , नाले के किनारे वाला तम्बू | हर रोज़ वो बाज़ार में ऐसे ही हजारों लोगों को आते-जाते देखता है |
हर रोज़ वो एक ही जगह पर बैठता है| उसके के लिए बाज़ार अपनी गति खो चुकी है| बाज़ार उसे अब शांत समुद्र लगता है| वो लोगों को देखता है, उनके चेहरों को पढने की कोशिश करता है,  कभी कभी उसकी आँखे किसी व्यक्ति से मिल जाये तो कुछ देने की प्राथना करता है |  किसी का दिल पिघला तो उसकी आँखे चमक जाती है |

आज उसे कूल मिला कर 8 रुपये मिले हैं, शाम होने को है वो अब बाज़ार से निकलने की सोचता है | नाला बाज़ार से ज्यादा दूर नहीं है, अभी निकलेगा तो 15-20 मिनट में पहुच जायेगा |  वो रास्ते के एक दुकान से 
100 ग्राम चावल लेता है, और अपने तम्बू-वाले घर की तरफ निकल जाता है |  उसकी  चाल से उसके उम्र और थकान दोनों का पता चल रहा था | घर पहुँच कर उसने एक प्लास्टिक का डब्बा उठाया और उसमे चावल फूलने के लिए डाल दिया |

आज कुछ अलग सी शांति थी उसके चेहरे पर,  ऐसा लग रहा था, उसका बरसो का सोचा काम आज हो गया है| अचानक वो अपने तम्बू के उतरी कोने में कुछ खोदने लगता है, थोड़ी देर में वो एक गुल्लक निकालता है, और उसे तोड़ता है| आज के बचाए 4 रुपये जोड़ कर, गिनती शुरू करता है, पूरे दस हज़ार | उसके सात साल की बचत |

चावल अब तक खाने लायक हो गया है, वो नमक मिला कर चावल खाने लगता है| खाते समय उसे कल के बचे हुए प्याज की याद आती है, वो उठ कर प्याज लेता है, और चावल के साथ खाने लगता है| आज पता नहीं क्यूँ 
उसे नींद नहीं आ रही है, एक अलग सी बेचैनी है उसे |  रात में उठ कर फिर से पैसों को गिनता है| 

पूरी रात वो सो नहीं सका, अजीब सी उधेड़ बून में लगा रहा |  रात के अन्तिम पहर में उसकी आँखें लग गयी | जब सुबह उठा तो सुबह के दस बज चुके थे, सूरज की चमक देख कर वो जल्दी से उठा | उसने पहले पैसे देखे, और फिर एक बार और गिना |

आज वो अपने उम्र के हिसाब से काफी तेज चल रहा था |