Wednesday, January 18, 2012

स्मित-बुद्ध ...

शरद की श्यामल साँझ
हृदय की बोझल उच्छावास
कभी  पुलकित, कभी क्रुद्ध
दृग पलकों को मूंदे,  दूर बैठा स्मित-बुद्ध !

मृदुल मिलन की आस
अतृप्त मन की अथक तलाश
संग थी ज्योत, अब सभी मार्ग अवरुद्ध
दृग पलकों को मूंदे,  दूर बैठा स्मित-बुद्ध !

नीरव-सरिता में कुमुद प्यासा
संजोये, आलिंगन की चिर-लालसा
अब है विष से विषाक्त, था कभी सुधा से शुद्ध
दृग पलकों  को मूंदे,  दूर बैठा स्मित-बुद्ध !

रजनी का मार्मिक क्रंदन
निर्झर बहते अश्रु-कण
थे प्राण-प्रिये,  हुए धूल से तुच्छ
दृग पलकों  को मूंदे,  दूर बैठा स्मित-बुद्ध !

हृदय का तीव्र  स्पंदन
विक्षिप्त है, आहत मन
कभी उत्साहित, कभी छुब्ध
दृग पलकों  को मूंदे,  दूर बैठा स्मित-बुद्ध !

प्रकृति की चिरपरिचित  क्रीड़ा
आसक्त मन में , निहीत है पीड़ा
दीप और तिमिर का शाश्वत-युद्ध
दृग पलकों  को मूंदे,  दूर बैठा स्मित-बुद्ध !

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