Sunday, September 25, 2011

वो कवि है


समझता है ,
      पुष्प की अभिलाषा को |
      तरुण की जिज्ञासा को |

लिखा है जिसने, वेश्या की प्रीत को |
और कभी,  गूंगे के गीत को |

देखा है, कई बार पिछडो का स्वप्न |
जाना है जो मूर्खो का दर्शन |

रची है जिसने, शब्दों की सृष्टि |
दी है,  नेत्रहीनो को दृष्टि | 

छुआ है , रात की परछाई को |
जाना है जिसने, भीड़ की तन्हाई को |

सजाया है, यौवन-क्रीडा को |
किया अनुभव, आसक्त मन की पीड़ा को |

खोजा , दीपक तले तम को |
बताया ,जीवन के मर्म को |

है परख जिसे  
       निरीह की शक्ति की ,
        नास्तिक की भक्ति की 

वो कवि है |

Tuesday, May 31, 2011

तुम

एक निर्मम प्यास हो तुम !
या जीवन की एकमात्र आस हो तुम ?

एक प्याला पीयूष का हो !
या एक घूंट विष का हो ?

क्या हो तुम ?
मरुस्थल की मृगतृष्णा!
या हिमालय से निकली यमुना?

तुम तो !
रवि की उष्णता हो ।
और शशि की शीतलता भी !

तुममे ;
दश्त का सुकून है ।
और शहर का जुनून भी !

तुम कवि की
व्यथा भरी कथा हो ।
और हर्ष की पराकाष्ठा भी !

तुममेरी रचना हो।
और कोरी कल्पना भी !