समझता है ,
पुष्प की अभिलाषा को |
तरुण की जिज्ञासा को |
लिखा है जिसने, वेश्या की प्रीत को |
और कभी, गूंगे के गीत को |
देखा है, कई बार पिछडो का स्वप्न |
जाना है जो मूर्खो का दर्शन |
रची है जिसने, शब्दों की सृष्टि |
दी है, नेत्रहीनो को दृष्टि |
छुआ है , रात की परछाई को |
जाना है जिसने, भीड़ की तन्हाई को |
सजाया है, यौवन-क्रीडा को |
किया अनुभव, आसक्त मन की पीड़ा को |
खोजा , दीपक तले तम को |
बताया ,जीवन के मर्म को |
है परख जिसे
निरीह की शक्ति की ,
नास्तिक की भक्ति की
वो कवि है |
