कंक्रीट के घने जंगल में,
सोच रहा है, वो अकेला ।
रोज देखता रहता है वो,
आंकड़ो का अनूठा मेला।
लगा, तंबू सब बेच रहे हैं,
कहते इसको कारोबार ।
जीवन प्रयन्त चलता ये चक्र,
कभी न रुकता है संसार ।
क्रय -विक्रय का खेल अनोखा ,
हर कोई है इसका मारा ।
कभी तैरते तुम , मझधार में ,
कभी पकड़ लेते किनारा ।
कभी नहीं मिटती भूख यहाँ ,
खा लो चाहे जितने अनार ।
हर किसी को तलब लगी है ,
हर कोई है यहाँ बीमार ।
महल बनाने का सपना पाले ,
फिरता रहा मारा -मारा ।
बना कर महल वो क़र्ज़ का ,
कहलाता, महल-वाला बेचारा !
सोच रहा है, वो अकेला ।रोज देखता रहता है वो,
आंकड़ो का अनूठा मेला।
लगा, तंबू सब बेच रहे हैं,
कहते इसको कारोबार ।
जीवन प्रयन्त चलता ये चक्र,
कभी न रुकता है संसार ।
क्रय -विक्रय का खेल अनोखा ,
हर कोई है इसका मारा ।
कभी तैरते तुम , मझधार में ,
कभी पकड़ लेते किनारा ।
कभी नहीं मिटती भूख यहाँ ,
खा लो चाहे जितने अनार ।
हर किसी को तलब लगी है ,
हर कोई है यहाँ बीमार ।
महल बनाने का सपना पाले ,
फिरता रहा मारा -मारा ।
बना कर महल वो क़र्ज़ का ,
कहलाता, महल-वाला बेचारा !
sahi..mast hai khas kar ke 3rd aur last para.
ReplyDeleteDhanywad baba, :)
Deletea thoughtful recitation to the denizens of the deep.. :)
ReplyDeletebaba ji ki booti.... jai ho maharaj
ReplyDelete:)
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