स्वपन निरर्थक बुनते तुम,
उनमे मादक अर्थ घोल दाल
मोहिनी माया रचते तुम |
प्राण वायु को झंकृत कर
जीवन-राग सुनाते हो,
स्मृतियों को साक्ष्य बनाकर
सुरीला षड़यंत्र रचते तुम |
चाहे हो प्रियतम का स्पर्श
या निरुपम-दृश्य-प्रहर्ष,
अंतरंग होंठो का अमर्त्य स्वाद
वर्षा-सुगंध या माधुर्य राग |
तुममे प्रकृति की अनुभूति है
हर अनुभव तुममे सीमाबद्ध ,
घटनाक्रम के मृगतृष्णा में
प्रतिबिंबित करते संबंध स्पष्ट।
प्रतिबिंबित करते संबंध स्पष्ट।
तुम कारण हो हर कारण का
हर कारण तुममे बसता है ,
जो अंत तुम्हारा होता है
तो शाश्वत स्वपन टूटता है |
मैं तुममे निहीत नहीं
तुम मुझमे निहित हो ,
मैं निश्चल-नित्य-निराकार ब्रहम
तुम चंचल-चतुर-चिरंतन भ्रम |
तुम चंचल-चतुर-चिरंतन भ्रम |

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