इसी भीड़ में एक भिखारी बैठा है, थक गया है वो भीख माँगते माँगते | सुबह से कुछ 5 -6 रुपये मिले होंगे उसे| पर आजकल 5 -6 रूपये से क्या होता है!? वो सोच रह है दस हो जाते तो वो घर चला जायेगा| घर से मतलब है , नाले के किनारे वाला तम्बू | हर रोज़ वो बाज़ार में ऐसे ही हजारों लोगों को आते-जाते देखता है |
हर रोज़ वो एक ही जगह पर बैठता है| उसके के लिए बाज़ार अपनी गति खो चुकी है| बाज़ार उसे अब शांत समुद्र लगता है| वो लोगों को देखता है, उनके चेहरों को पढने की कोशिश करता है, कभी कभी उसकी आँखे किसी व्यक्ति से मिल जाये तो कुछ देने की प्राथना करता है | किसी का दिल पिघला तो उसकी आँखे चमक जाती है |
आज उसे कूल मिला कर 8 रुपये मिले हैं, शाम होने को है वो अब बाज़ार से निकलने की सोचता है | नाला बाज़ार से ज्यादा दूर नहीं है, अभी निकलेगा तो 15-20 मिनट में पहुच जायेगा | वो रास्ते के एक दुकान से
100 ग्राम चावल लेता है, और अपने तम्बू-वाले घर की तरफ निकल जाता है | उसकी चाल से उसके उम्र और थकान दोनों का पता चल रहा था | घर पहुँच कर उसने एक प्लास्टिक का डब्बा उठाया और उसमे चावल फूलने के लिए डाल दिया |
आज कुछ अलग सी शांति थी उसके चेहरे पर, ऐसा लग रहा था, उसका बरसो का सोचा काम आज हो गया है| अचानक वो अपने तम्बू के उतरी कोने में कुछ खोदने लगता है, थोड़ी देर में वो एक गुल्लक निकालता है, और उसे तोड़ता है| आज के बचाए 4 रुपये जोड़ कर, गिनती शुरू करता है, पूरे दस हज़ार | उसके सात साल की बचत |
चावल अब तक खाने लायक हो गया है, वो नमक मिला कर चावल खाने लगता है| खाते समय उसे कल के बचे हुए प्याज की याद आती है, वो उठ कर प्याज लेता है, और चावल के साथ खाने लगता है| आज पता नहीं क्यूँ
उसे नींद नहीं आ रही है, एक अलग सी बेचैनी है उसे | रात में उठ कर फिर से पैसों को गिनता है|
पूरी रात वो सो नहीं सका, अजीब सी उधेड़ बून में लगा रहा | रात के अन्तिम पहर में उसकी आँखें लग गयी | जब सुबह उठा तो सुबह के दस बज चुके थे, सूरज की चमक देख कर वो जल्दी से उठा | उसने पहले पैसे देखे, और फिर एक बार और गिना |
आज वो अपने उम्र के हिसाब से काफी तेज चल रहा था |
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