Thursday, July 25, 2013

भीड़ का भिखारी


बाज़ार में बहुत भीड़ थी | हर कोई कुछ ना कुछ खरीद रहा था | वैसे बाज़ार की भी अपनी एक आवाज़ होती है, एक ऐसी आवाज़ जो हजारों आवाजों के मिलने से बनती  है | ऐसा लगता है, मानो ढेर सारे लोग मधुमखियों की आवाज़ निकालने की कोशिश कर रहे हैं | बाज़ार से बाहर निकलने पर ऐसा लगता है जैसे एक अरसे बाद कहीं से निकला हूँ | बाज़ार में  समय तेज चलने लगता है, हर कोई भागता फिरता है | सब कुछ न कुछ करते रहते हैं, कोई खरीदता है, कोई बेचता है |

इसी भीड़ में एक भिखारी बैठा है, थक गया है वो भीख माँगते माँगते | सुबह से कुछ 5 -6  रुपये मिले होंगे उसे| पर आजकल 5 -6  रूपये से क्या होता है!?  वो सोच रह है दस हो जाते तो वो घर चला जायेगा| घर से मतलब है , नाले के किनारे वाला तम्बू | हर रोज़ वो बाज़ार में ऐसे ही हजारों लोगों को आते-जाते देखता है |
हर रोज़ वो एक ही जगह पर बैठता है| उसके के लिए बाज़ार अपनी गति खो चुकी है| बाज़ार उसे अब शांत समुद्र लगता है| वो लोगों को देखता है, उनके चेहरों को पढने की कोशिश करता है,  कभी कभी उसकी आँखे किसी व्यक्ति से मिल जाये तो कुछ देने की प्राथना करता है |  किसी का दिल पिघला तो उसकी आँखे चमक जाती है |

आज उसे कूल मिला कर 8 रुपये मिले हैं, शाम होने को है वो अब बाज़ार से निकलने की सोचता है | नाला बाज़ार से ज्यादा दूर नहीं है, अभी निकलेगा तो 15-20 मिनट में पहुच जायेगा |  वो रास्ते के एक दुकान से 
100 ग्राम चावल लेता है, और अपने तम्बू-वाले घर की तरफ निकल जाता है |  उसकी  चाल से उसके उम्र और थकान दोनों का पता चल रहा था | घर पहुँच कर उसने एक प्लास्टिक का डब्बा उठाया और उसमे चावल फूलने के लिए डाल दिया |

आज कुछ अलग सी शांति थी उसके चेहरे पर,  ऐसा लग रहा था, उसका बरसो का सोचा काम आज हो गया है| अचानक वो अपने तम्बू के उतरी कोने में कुछ खोदने लगता है, थोड़ी देर में वो एक गुल्लक निकालता है, और उसे तोड़ता है| आज के बचाए 4 रुपये जोड़ कर, गिनती शुरू करता है, पूरे दस हज़ार | उसके सात साल की बचत |

चावल अब तक खाने लायक हो गया है, वो नमक मिला कर चावल खाने लगता है| खाते समय उसे कल के बचे हुए प्याज की याद आती है, वो उठ कर प्याज लेता है, और चावल के साथ खाने लगता है| आज पता नहीं क्यूँ 
उसे नींद नहीं आ रही है, एक अलग सी बेचैनी है उसे |  रात में उठ कर फिर से पैसों को गिनता है| 

पूरी रात वो सो नहीं सका, अजीब सी उधेड़ बून में लगा रहा |  रात के अन्तिम पहर में उसकी आँखें लग गयी | जब सुबह उठा तो सुबह के दस बज चुके थे, सूरज की चमक देख कर वो जल्दी से उठा | उसने पहले पैसे देखे, और फिर एक बार और गिना |

आज वो अपने उम्र के हिसाब से काफी तेज चल रहा था |   


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