बचपन को देखा है कभी ?
जाड़े की उस बहती नदी की तरह है!
तरल, बिलकुल निर्मल,
गरम भाप भरी अंगड़ाइयाँ लिये |
अब कभी महसूस किया है उसे ?
मिला करता है, पलकों के पीछे।
सपनो के चादर में लिपटे,
बेफिक्री की खिलखिलाहट लिये |
छूट गया !
जैसे हर कुछ छूटता है |
खो गया है,
जवानी की उस सपाट-बंजर-दरदरी खेतों में |
छुप गया है कहीं,
दुनियादारी के डर से,
शायद, उस घने आम के पेड़ के बीच में !
या फिर,
उस कटी पतंग को ढूंढने गया होगा |
लौट आएगा वापस...
जाड़े की उस बहती नदी की तरह है!
तरल, बिलकुल निर्मल,
गरम भाप भरी अंगड़ाइयाँ लिये |
अब कभी महसूस किया है उसे ?
मिला करता है, पलकों के पीछे।
सपनो के चादर में लिपटे,
बेफिक्री की खिलखिलाहट लिये |
छूट गया !
जैसे हर कुछ छूटता है |
खो गया है,
जवानी की उस सपाट-बंजर-दरदरी खेतों में |
छुप गया है कहीं,
दुनियादारी के डर से,
शायद, उस घने आम के पेड़ के बीच में !
या फिर,
उस कटी पतंग को ढूंढने गया होगा |
लौट आएगा वापस...

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