आज एक सपना देखा,
सपने में पूड़ी और सब्ज़ी देखी ।
पीले रंग की पूड़ी, उसके अंदर भरी हुई दाल भी पीली।
सब्ज़ी का भी रंग पीला ।
पूड़ी से एक खुशबू आ रही थी ।
मैंने पूछ लिया, आजकल कैसी हो ?
उसने कहा, अच्छी हूँ,
आपके जूनियर्स आते रहते हैं ।
बगल में, शीशे के ग्लास में चाय रखी थी।
उससे आती खुशबू ने, इस बात पर मुस्कुरा दिया।
चाय ने पुछा, वहाँ की चाय कैसी होती है ?
मैंने कहा, कुछ खास नहीं।
तुम चाय हो, वो चाय जैसी होती हैं …
फिर बातचीत में हमेशा की तरह मौसम ने कदम रखा ,
उनके ये पूछने पर मैंने कहा,
हवाएँ तो ठण्डी और शुष्क हैं !
पर उनमे ठहाको की बड़ी कमी है …
बातें चलती रही, दिन चढ़ रहा था।
मेरी नींद खुली तो, यहाँ रात गहरी थी।
बहुत उम्दा लिखे हो!
ReplyDeleteDhanyawad dost! :)
Deleteबहुत खूब कविराज
ReplyDeleteपर सच कहूँ तो मुझे भिंडी की सब्जी याद आ गयी, इंतेज़ार है मुझे उस दिन का का जब आप इस्पे कुछ लिखंगे.
ReplyDeletehaan jarur :)
Deleteतुम चाय हो, वो चाय जैसी होती हैं … is pankti ne choo liya..and the ending as always.. bahut achchi lagi :)
ReplyDeleteDhanyawad!!
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