शरद की श्यामल साँझहृदय की बोझल उच्छावास
कभी पुलकित, कभी क्रुद्ध
दृग पलकों को मूंदे, दूर बैठा स्मित-बुद्ध !
मृदुल मिलन की आस
अतृप्त मन की अथक तलाश
संग थी ज्योत, अब सभी मार्ग अवरुद्धदृग पलकों को मूंदे, दूर बैठा स्मित-बुद्ध !
नीरव-सरिता में कुमुद प्यासा
संजोये, आलिंगन की चिर-लालसा
अब है विष से विषाक्त, था कभी सुधा से शुद्ध
रजनी का मार्मिक क्रंदन
निर्झर बहते अश्रु-कण
थे प्राण-प्रिये, हुए धूल से तुच्छ
दृग पलकों को मूंदे, दूर बैठा स्मित-बुद्ध !हृदय का तीव्र स्पंदन
विक्षिप्त है, आहत मन
कभी उत्साहित, कभी छुब्ध
दृग पलकों को मूंदे, दूर बैठा स्मित-बुद्ध !
प्रकृति की चिरपरिचित क्रीड़ा
आसक्त मन में , निहीत है पीड़ा
दीप और तिमिर का शाश्वत-युद्ध
दृग पलकों को मूंदे, दूर बैठा स्मित-बुद्ध !
mridul milan ki aas... :)
ReplyDeletekeep writing.... :)