एक निर्मम प्यास हो तुम !
या जीवन की एकमात्र आस हो तुम ?
क्या हो तुम ?
मरुस्थल की मृगतृष्णा!
या हिमालय से निकली यमुना?
तुम तो !
रवि की उष्णता हो ।
और शशि की शीतलता भी !
तुममे ;
दश्त का सुकून है ।
और शहर का जुनून भी !
तुम कवि की
व्यथा भरी कथा हो ।
और हर्ष की पराकाष्ठा भी !
तुममेरी रचना हो।
और कोरी कल्पना भी !
या जीवन की एकमात्र आस हो तुम ?
एक प्याला पीयूष का हो !
या एक घूंट विष का हो ?क्या हो तुम ?
मरुस्थल की मृगतृष्णा!
या हिमालय से निकली यमुना?
तुम तो !
रवि की उष्णता हो ।
और शशि की शीतलता भी !
तुममे ;
दश्त का सुकून है ।
और शहर का जुनून भी !
तुम कवि की
व्यथा भरी कथा हो ।
और हर्ष की पराकाष्ठा भी !
तुममेरी रचना हो।
और कोरी कल्पना भी !
Sarahniya prayaas .. aasha hai aapki lekhni aage bhi yatharth ke dharatal se parichay karati rahegi :)
ReplyDeleteaapki tippani ke liye bahut bahut dhanywad, humari poori koshish rahegi :)
ReplyDeletemachau...baba
ReplyDeletethank you baba :)
ReplyDeleteGood One !
ReplyDeletenice.. :)
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeleteआपकी कविता पढ़ के लगा की मानो मुझे एक प्याला मिल गया पीयूष का ..;) , बहुद ही उम्दा लेखनी !!
ReplyDeleteशब्दों का चयन भी काफी सही किया है आपने ...आपकी अगली रचना के इंतज़ार में ..:)
bahut bahut , dhanyavad piyush maharaaj :)
ReplyDeletesahi hai baba...waise ek baat aaj tak samajh me nai ayi...hindi ki kavita pe comment me log ekdum hindi pel dete haiin...kahe?
ReplyDeletesidhath ji yah kafi prernaspad kavita hai ...aisi aur anya rachnao ka nirmaan kariye ...badhiya
ReplyDelete@ ravi , ye to pissu hi bata sakta hai!! :)
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