Saturday, September 11, 2010

मैं जीत रहा हूँ !

फिर से कुछ करने की चाहत उमढ़ गयी है |
मैं तोड़ देना चाहता हूँ सारे बन्धन |

फिर से लहरों की उन्माद में बह जाना चाहता हूँ |
अब और नहीं झेल सकता ये आवारगी|

कुछ तो करना हीं होगा !
आखीर कब तक?
कब मैं जागुँगा ?
ये नींद नहीं है प्यारी मुझे !

अब फीर से सपने देखता हूँ मैं..
वही पंख ,वही नीला अम्बर ,
वही लालीमा लीए क्षितिज |
वही चहक...

अब तो शक्ती का श्रोत है मेरे पास|
अब ना तो भय है |
ना ही उस अन्धकार का साया|
ना ही उस मज्धार का भवर|

मैं मग्न हूँ ,अपने धुन में।
अब कोहरा हट रहा है |
अब धुंध छट रही है |
मैं जीत रहा हूँ...

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